स्वतंत्र मेडिकल एक्सपर्ट राय के बिना डॉक्टरों पर मेडिकल लापरवाही का आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट

  • On: January 15, 2026
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स्वतंत्र मेडिकल एक्सपर्ट राय के बिना डॉक्टरों पर मेडिकल नेग्लिजेंस का आपराधिक मुकदमा नहीं – पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि बिना स्वतंत्र और सक्षम मेडिकल एक्सपर्ट की राय के डॉक्टरों के खिलाफ मेडिकल लापरवाही (Medical Negligence) का आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि केवल शिकायतकर्ता या जांच अधिकारी की राय के आधार पर डॉक्टरों को आपराधिक मुकदमे में घसीटना न्यायसंगत नहीं है।

यह फैसला डॉक्टरों को अनावश्यक आपराधिक उत्पीड़न से बचाने और चिकित्सा पेशे की गरिमा बनाए रखने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला वर्ष 2015 का है, जिसमें एक महिला को प्रसव पीड़ा के बाद धवन नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया था। शिकायतकर्ता (मृतका के पति) के अनुसार:

  • डॉक्टरों ने पहले सामान्य प्रसव का आश्वासन दिया
  • बाद में सर्जरी (ऑपरेशन) की गई
  • महिला ने जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया
  • प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव (Postpartum Hemorrhage) हुआ
  • हालत बिगड़ने पर महिला को दूसरे अस्पताल रेफर किया गया
  • 05 जनवरी 2015 को महिला की मृत्यु हो गई

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि ऑपरेशन सही तरीके से नहीं किया गया, जिसके कारण उसकी पत्नी की मृत्यु हुई।

डॉक्टरों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही

प्रारंभिक साक्ष्यों के आधार पर मजिस्ट्रेट कोर्ट ने डॉक्टरों को:

  • IPC की धारा 304-A (लापरवाही से मृत्यु)
  • धारा 34 (सामूहिक अपराध)

के तहत तलब कर लिया।

डॉक्टरों को गिरफ्तारी से बचने के लिए जमानत तक लेनी पड़ी, जिससे उनकी सामाजिक और पेशेवर प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।

डॉक्टरों की दलील

डॉक्टरों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि:

  • उनके खिलाफ कोई स्वतंत्र मेडिकल प्रमाण नहीं है
  • दूसरे अस्पताल के वरिष्ठ डॉक्टर डॉ. राणा रंजीत सिंह ने स्पष्ट रूप से कहा कि: मरीज को Postpartum Hemorrhage और Disseminated Intravascular Coagulation (DIC) हुआ था यह एक जटिल मेडिकल स्थिति थी, न कि लापरवाही

इसके अलावा:

  • सिविल सर्जन, तरनतारन द्वारा गठित मेडिकल बोर्ड ने भी जांच कर डॉक्टरों को निर्दोष बताया
  • उपभोक्ता फोरम में दायर शिकायत डिफॉल्ट में खारिज हो चुकी थी

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां

न्यायमूर्ति मनीषा बत्रा ने कहा:

“जांच अधिकारी या निजी शिकायतकर्ता से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि उसे मेडिकल साइंस का विशेषज्ञ ज्ञान हो। यह तय करना कि कोई कार्य आपराधिक लापरवाही है या नहीं, केवल विशेषज्ञ डॉक्टर ही कर सकता है।”

कोर्ट ने आगे कहा:

“एक बार आपराधिक प्रक्रिया शुरू हो जाने पर डॉक्टर को गंभीर मानसिक पीड़ा, सामाजिक बदनामी और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, जिसकी भरपाई किसी भी स्तर पर संभव नहीं है।”

स्वतंत्र मेडिकल राय अनिवार्य

हाईकोर्ट ने स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा कि:

  • डॉक्टर के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने से पहले
  • सरकारी सेवा में कार्यरत, उसी विशेषज्ञता वाले स्वतंत्र डॉक्टर से निष्पक्ष मेडिकल राय लेना अनिवार्य है
  • बिना ऐसी राय के डॉक्टरों पर IPC 304-A के तहत केस नहीं चलाया जा सकता

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निम्न महत्वपूर्ण फैसलों पर भरोसा किया:

  • Jacob Mathew बनाम State of Punjab
  • Martin F. D’Souza बनाम Mohd. Ishfaq

इन फैसलों में स्पष्ट किया गया है कि:

  • आपराधिक मेडिकल लापरवाही के लिए साधारण गलती पर्याप्त नहीं
  • लापरवाही गंभीर, घोर और लापरवाह आचरण की श्रेणी में होनी चाहिए
  • उपचार असफल होना या निर्णय में त्रुटि होना अपराध नहीं है

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मजिस्ट्रेट के आदेश पर सवाल

हाईकोर्ट ने पाया कि मजिस्ट्रेट ने:

  • मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को नजरअंदाज किया
  • उस गवाही पर भरोसा किया, जिसमें लापरवाही सिद्ध नहीं होती थी

कोर्ट ने कहा:

“रिकॉर्ड पर उपलब्ध मेडिकल साक्ष्य यह साबित नहीं करते कि डॉक्टरों की किसी लापरवाही के कारण महिला की मृत्यु हुई।”

हाईकोर्ट का अंतिम फैसला

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने:

  • डॉक्टरों के खिलाफ दर्ज शिकायत और आपराधिक कार्यवाही को रद्द (Quash) कर दिया
  • कहा कि प्रथम दृष्टया (Prima Facie) मेडिकल लापरवाही सिद्ध नहीं होती

फैसले का महत्व

यह फैसला:

  • डॉक्टरों को फर्जी और भावनात्मक शिकायतों से सुरक्षा देता है
  • जांच एजेंसियों और अदालतों को मेडिकल मामलों में सावधानी बरतने का संदेश देता है
  • चिकित्सा पेशे की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को मजबूत करता है

निष्कर्ष

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का यह निर्णय एक बार फिर स्पष्ट करता है कि मेडिकल लापरवाही के मामलों में आपराधिक कानून का प्रयोग बेहद सावधानी से किया जाना चाहिए। बिना स्वतंत्र और विशेषज्ञ मेडिकल राय के डॉक्टरों को अपराधी ठहराना न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि समाज के लिए भी नुकसानदेह है।

Tags: Medical Negligence Case, | Doctors Criminal Liability, | Independent Medical Opinion, | Punjab and Haryana High Court, | Criminal Prosecution of Doctors,
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FAQ's

The CMAT City Intimation Slip is a document released by the National Testing Agency (NTA) that tells candidates the city where their CMAT 2026 exam centre has been allotted. It helps candidates plan travel and stay before the exam day.

No. The city slip only shows the allotted exam city, whereas the CMAT admit card (released later) contains full details including the actual centre address, exam timings, reporting instructions, and entry requirements.

You can download it from the official CMAT website at cmat.nta.nic.in by logging in using your application number and date of birth (or password) once the city slip link is active.

No. Once the city is allotted and shown on the city slip, you cannot change it later. Any changes must have been done during the application or correction window before the city slip was released.

Note your allotted city and prepare travel plans if required.

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