वंदे मातरम् में अब तक हुए बदलाव और इसकी मूल स्क्रिप्ट: एक विश्लेषण

  • On: December 8, 2025
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वंदे मातरम् गीत का ऐतिहासिक रूप और बदलाव

आज लोकसभा में एक बार फिर से राष्ट्रगीत "वंदे मातरम्" को लेकर चर्चा हो रही है। यह गीत भारतीय संस्कृति और स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बन चुका है। इस लेख में हम जानेंगे कि अब तक "वंदे मातरम्" में कितने बदलाव हुए हैं और इसकी मूल स्क्रिप्ट क्या है।

वंदे मातरम् का इतिहास:

"वंदे मातरम्" का आरंभ 1870 के दशक में हुआ था जब बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इस गीत की रचना की। यह गीत मातृभूमि की पूजा करने वाला था और इसे हिंदू देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया था। 1880 में बंकिम चंद्र ने इसे अपने उपन्यास "आनंदमठ" में प्रकाशित किया, जिसके बाद यह गीत बहुत प्रसिद्ध हो गया। हालांकि, इस गीत के कुछ छंदों में हिंदू देवताओं का उल्लेख था, जिस पर धार्मिक आपत्तियाँ उठने लगीं।

1937 में पहला बड़ा संशोधन:

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब यह गीत लोकप्रिय हो चुका था, मुस्लिम नेताओं ने उन छंदों पर आपत्ति जताई जो हिंदू देवियों की पूजा से संबंधित थे। उन्होंने कहा कि ये पंक्तियाँ इस्लामी मान्यताओं के खिलाफ थीं। इसके बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1937 में एक निर्णय लिया, जिसमें यह घोषणा की गई कि "वंदे मातरम्" के केवल पहले दो छंदों को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया जाएगा। इन छंदों में किसी भी प्रकार की धार्मिक छवि का उल्लेख नहीं था, जिससे यह सभी समुदायों के लिए स्वीकार्य बन सके।

यह संशोधन इस्लामी समुदाय की संवेदनाओं का सम्मान करने और सभी भारतीयों को एकजुट रखने के उद्देश्य से किया गया। इसके बाद "वंदे मातरम्" को एक विभाजनकारी शक्ति की बजाय एक एकजुट करने वाली शक्ति बनाने की कोशिश की गई।

1950 में संविधान सभा द्वारा मान्यता:

24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने आधिकारिक रूप से 1937 के दो छंदों वाले संस्करण को भारत के राष्ट्रगीत के रूप में अपनाया। तब से अब तक वंदे मातरम् में कोई और बदलाव नहीं हुआ है और यह गीत भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बना हुआ है।

वंदे मातरम् की मूल स्क्रिप्ट:

"वंदे मातरम्" की मूल रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा की गई थी और यह एक प्रेरणादायक गीत है, जिसमें मातृभूमि की महिमा और उसके साथ जुड़े भावनाओं का विस्तार से वर्णन किया गया है।

मूल स्क्रिप्ट:

वन्दे मातरम्।
सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम्,
शस्यश्यामलाम् मातरम्।
वन्दे मातरम्।।

शुभ्रज्योत्स्ना पुलकितयामिनीम्,
फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीम् सुमधुरभाषिणीम्,
सुखदाम् वरदाम् मातरम्। वन्दे मातरम्।।

कोटि-कोटि कण्ठ कल-कल निनाद कराले,
कोटि-कोटि भुजैधृत खरकरवाले,
के वॉले माँ तुमि अबले,
बहुवलधारिणीं नमामि तारिणीम्,
रिपुदलवारिणीं मातरम्। वन्दे मातरम्।।

तुमि विद्या तुमि धर्म, तुमि हदि तुमि मर्म,
त्वम् हि प्राणाः शरीरे, बाहुते तुमि माँ शक्ति,
हृदये तुमि माँ भक्ति, तोमारेई प्रतिमा गड़ि मन्दिरे-मन्दिरे।
वन्दे मातरम्।।

त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,
कमला कमलदलविहारिणी,
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्,
नमामि कमलाम्, अमलाम् अतुलाम्,
सुजलां सुफलां मातरम्। वन्दे मातरम्।।

श्यामलाम् सरलाम् सुस्मिताम् भूषिताम्,
धरणीम् भरणीम् मातरम्। वन्दे मातरम्।।

क्या हैं वंदे मातरम् के बदलाव के कारण?

वंदे मातरम् में किए गए बदलावों का मुख्य उद्देश्य यह था कि यह गीत हर भारतीय समुदाय द्वारा समान रूप से अपनाया जा सके। 1937 में बदलाव के बाद यह गीत सभी धर्मों के बीच एकता का प्रतीक बन गया। बदलाव का प्रमुख कारण यह था कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान समाज में विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच सामंजस्य बनाए रखना अत्यंत आवश्यक था।

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निष्कर्ष:

"वंदे मातरम्" भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक अमूल्य धरोहर है, जिसे हर भारतीय अपने दिल में महसूस करता है। इसके मूल रूप में बदलाव किए गए थे ताकि यह राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक के लिए सम्मानजनक और समावेशी हो सके। आज यह गीत न केवल हमारी एकता का प्रतीक है, बल्कि यह हमारे इतिहास, संस्कृति और हमारी मातृभूमि के प्रति श्रद्धा को भी दर्शाता है।

हमें इस राष्ट्रगीत के महत्व को समझते हुए इसे गर्व से गाना चाहिए और इसका सम्मान करना चाहिए।

Tags: Vande Mataram, | National Song, | Vande Mataram Debate, | Indian Independence, | National Anthem, | Bunkim Chandra Chattopadhyay,
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